AI से किए गए सर्वे कितने भरोसेमंद? मशहूर सर्वे कंपनी के आंकड़ों से हुआ बड़ा खुलासा

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आज के दौर में AI का इस्तेमाल लगभग हर कोई करता है और इसके जरिए काफी हद तक चीजों में लोगों की मदद भी होती है. लेकिन, अब AI सिर्फ सवालों के जवाब देने या तस्वीरें बनाने तक सीमित नहीं है बल्कि लोग इसके इस्तेमाल को लेकर अलग-अलग एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं. अब AI के जरिए ये भी अंदाजा लगाने की कोशिश की जा रही है कि आम लोग किसी मुद्दे पर क्या सोचते हैं. लेकिन क्या AI सच में इंसानों की राय की जगह ले सकता है?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI दिन-ब-दिन एडवांस होता जा रहा है. लेकिन, हाल ही में एक रिसर्च की गई, जिसमें AI के जरिए लोगों की राय के बारे में पता लगाया गया. लेकिन, रिपोर्ट में पाया गया कि AI से तैयार किए गए नकली या सिंथेटिक सर्वे, असली लोगों की राय को ठीक से दोहरा नहीं पाए. जिसके बाद Pew Research Center की नई रिपोर्ट AI के लोगों की राय जानने के सवाल का जवाब काफी हद तक नहीं में देती है.

सर्वे के अंतर में दिखा बड़ा फर्क

30 सितंबर 2026 को जारी रिपोर्ट में बताया गया कि रिसर्च सेंटर ने तीन पुराने सर्वे को AI के बनाए हुए डिजिटल ट्विन प्रतिभागियों के साथ दोबारा कराया. इन AI प्रतिभागियों को असली सर्वे में शामिल लोगों की उम्र, जनसांख्यिकीय जानकारी और दूसरी विशेषताओं के आधार पर तैयार किया गया था. सर्वे की तुलना American Trends Panel (ATP) से की गई, जोलगभग उसी समय वास्तविक लोगों से के जरिए लिए गए थे.

नतीजा चौंकाने वाला रहा, करीब 300 अलग-अलग सर्वे सवालों में AI के जवाब और इंसानों के जवाबों में औसतन 12 प्रतिशत अंक का अंतर देखा गया.करीब 28% सवालों में यह अंतर 15 प्रतिशत अंक से भी ज्यादा था. इतना ही नहीं, कुछ सवालों के जवाब में AI और इंसानों की राय के बीच 20, 30 और यहां तक कि 40 प्रतिशत अंक से ज्यादा का फर्क भी देखने को मिला.

AI ने किस तरह की गलतियां की

कुछ ग्रुप के मामले में गलती और भी ज्यादा थी. एग्जाम्पल के लिए, AI ने अनुमान लगाया कि 97% हिस्पैनिक वयस्क विश्व कप को कम से कम कुछ हद तक फॉलो करेंगे, जबकि वास्तविक आंकड़ा सिर्फ 43% था. इसी तरह, AI के अनुसार 95% रिपब्लिकन और रिपब्लिकन समर्थक निर्दलीयों का इजराइल के प्रति अनुकूल नजरिया है, जबकि असल हिस्सेदारी 58% थी. वहीं, AI ने अनुमान लगाया कि 86% डेमोक्रेट और डेमोक्रेट समर्थक अरबपतियों को देश के लिए बुरा मानते हैं, जबकि वास्तविक आंकड़ा 45% था.

इंसान जब किसी सवाल का जवाब नहीं जानता या किसी मुद्दे को लेकर कंफ्यूजन में होता है, तो वह आसानी से कह सकता है कि मुझे नहीं पता या मैं निश्चित नहीं हूं. AI के साथ ऐसा नहीं हुआ. एक्सपेरिमेंट में जब नॉट श्योर का ऑप्शन दिया गया, तो असल लोगों ने इसे करीब 16% बार चुना. वहीं AI प्रतिभागियों ने सिर्फ 4% बार ऐसा किया.

इंसानों की राय का सही अनुमान नहीं लगाया

AI सर्वेक्षण ने 2026 की शुरुआत में सामने आए कई अहम राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर इंसानों की राय का सही अनुमान नहीं लगाया. इसने तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कामकाज को मंजूरी देने वाले अमेरिकियों की संख्या को वास्तविक आंकड़ों से ज्यादा बताया. वहीं, इमिग्रेशन ऑफिसर्स के चेहरे ढकने को स्वीकार्य मानने वाले रिपब्लिकनों की संख्या को काफी कम आंका.

अलग-अलग AI मॉडल की अलग तस्वीर

यह फर्क इसलिए अहम है क्योंकि किसी सर्वे में सिर्फ जवाब ही मायने नहीं रखता, बल्कि यह भी मायने रखता है कि कितने लोग किसी बात को लेकर निश्चित हैं और कितने कंफ्यूजन में. रिपोर्ट का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि अलग-अलग AI मॉडल ने एक ही सवाल पर अलग तस्वीर पेश की. रिसर्च सेंटर ने GPT-5.1 और Claude Opus 4.6 से सर्वे के जवाब तैयार करवाए. दोनों मॉडल असल लोगों की राय से पूरी तरह मेल नहीं खा सके और कई मुद्दों पर दोनों के नतीजे भी एक-दूसरे से काफी अलग थे.

AI तेजी से डेटा का एनलाइस कर सकता है

इससे पता चलता है कि सिर्फ यह कहना काफी नहीं है कि AI ने सर्वे किया. यह भी जरूरी है कि कौन-सा AI मॉडल इस्तेमाल किया गया और उसे किस तरह तैयार किया गया. इस एक्सपेरिमेंट का मतलब ये नहीं है कि AI किसी काम का नहीं है. AI तेजी से डेटा का एनलाइस कर सकता है और अलग-अलग संभावनाओं को समझने में मदद कर सकता है. लेकिन जब सवाल लोगों की वास्तविक सोच, अनुभव और भावनाओं को जानने का हो, तो इंसानों से सीधे पूछना अभी भी बेहद महत्वपूर्ण है.

 

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