राजकुमार राव का दमदार अवतार: कोर्ट रूम में लड़ी कसाब के खिलाफ जंग, स्पेशल पीपी उज्जवल निकम का रोल किया साकार

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किसी कलाकार की जिंदगी में कुछ ऐतिहासिक घटनाएं अनायास भी जुड़ जाती हैं. साल 2012 में राजकुमार राव की एक फिल्म आई थी- शाहिद. उस फिल्म में बेहतरीन अभिनय के लिए उन्हें बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड मिला था. उसमें भी राजकुमार राव वकील शाहिद आजमी बने थे. तब शायद एक्टर ने सोचा नहीं होगा कि वे कसाब जैसे आतंकवादी को फांसी तक पहुंचाने वाले देश के विख्यात वकील उज्जवल निकम का किरदार भी निभाएंगे. लेकिन करीब चौदह साल बाद वह मौका आया और प्रहार- अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्जवल निकम में राजकुमार राव एक बार फिर वकील की भूमिका निभाते दिखे हैं.

आपको बताएं कि शाहिद भी रियल लाइफ स्टोरी थी और अविनाश अरुण के निर्देशन में बनी प्रहार भी एक बायोग्राफिकल ड्रामा है. अंतर सिर्फ इतना है कि शाहिद में वह आतंक के आरोपों में फंसे निर्दोष लोगों को न्याय दिलाकर तसल्ली पाते हैं जबकि प्रहार में आतंकवादी हमलों के पीड़ितों के जख्म को भरने का काम करते हैं और कसाब को फांसी पर लटकवा कर सुकून पाते हैं.

प्रहार की कहानी पर एक नजर

प्रहार में राजकुमार राव के अलावा वामिका गब्बी, ललित प्रभाकर, जयदीप अहलावत और सिकंदर खेर प्रमुख रोल में हैं. फिल्म में 1993 के मुंबई बम धमाकों का भी जिक्र है लेकिन 2008 के मुंबई हमलों की दर्द भरी कहानियां और उसकी कानूनी लड़ाई को ज्यादा दिखाया गया है, जिसमें केंद्रीय भूमिका प्रसिद्ध वकील उज्ज्वल निकम निभाते हैं.

फिल्म की शुरुआत उज्जवल निकम की बेटी की शादी के सीन से होती है. इसके बाद ताज अटैक, सीएसटी अटैक की घटनाएं सामने आती हैं और उज्जवल उस आतंकवादी वारदातों में पकड़े गए एकमात्र जिंदा आतंकवादी कसाब के खिलाफ केस लड़ना शुरू करते हैं और ये कहानी कसाब की फांसी तक जाती है.

दरअसल प्रहार एक ऐसी फिल्म है जिसकी कहानी कुछ भी अनप्रिडिक्टेबल नहीं है. साल 2008 से लेकर 2012 तक इस केस में क्या-क्या हुआ- सब खुली किताब की तरह है. ऐसे में सवाल आ सकता है कि जब मुंबई हमले को केंद्र में रखकर कई फिल्में और वेब सीरीज बन चुकी हैं तो राजकुमार राव की प्रहार क्यों देखें. यह सवाल वाजिब है लेकिन मुझे लगता है इस सवाल के आगे फिल्म देखने से खुद को रोकना नहीं चाहिए.

उज्जवल निकम के अंदर और बाहर प्रहार

फिल्म जिस तरीके से कहानी कहती है वहां ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि आतंकियों का प्रहार केवल ताज होटल या कि सीएसटी स्टेशन पर हुआ बल्कि यह प्रहार पाकिस्तान द्वारा भारत पर थोपा गया था, इंसानियत पर दहशत का प्रहार था, मानवता और न्याय पर प्रहार था, वकील के किरदार के रूप में उसके जज्बाती मिशन का उसकी पारिवारिक संवेदनाओं पर भी प्रहार था.

उज्जवल निकम कसाब को फांसी तक पहुंचाने के लिए चार साल तक लगातार केवल कानूनी लड़ाई नहीं लड़ते, अनेक प्रकार के द्वंद्व और दुश्वारियों से जूझते हैं. घर के अंदर कभी पत्नी की गंभीर बीमारी, कभी बेटे से उलझन, कभी बेटी की शादी तो कानूनी मोर्चे पर पाकिस्तान की कूटनीति, कोर्ट में कसाब का बार-बार पैंतरा अपनाना, आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान का बरगलाना और इन सबसे जूझना प्रहार को झेलने जैसा ही तो था. लेकिन निकम ने चट्टान बन कर हर हमले को झेला और जीत हासिल की.

कोई हैरत नहीं कि राजकुमार राव ने एक बार फिर उसी हौसले के साथ वकील का उम्दा किरदार निभाया है, जिसे हम शाहिद में देख चुके हैं. एक्टर की लाइफ की यह एक और अवॉर्ड विनिंग परफॉर्मेंस है. उज्जवल निकम ने इस केस को कितनी शिद्दत से लड़ा था, उसे इस संवाद से समझा जा सकता है जब वह कसाब से कहते हैं- “मुझे किसी केस को जीतने की खुशी तब तक नहीं मिलती जब तक मुजरिम के भीतर गलती की टीस पैदा न हो.”

 

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